Gandhi से बड़ा ट्रेवल इन्फ्लुएंसर कोई नहीं!

घुमक्कड़ी, यायावरी या फिर ट्रेवल, जो जी चाहे कह लीजिए पर जब भी कोई इंसान अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आता है और वो सब चीज़ें करने की कोशिश करता है जो वह आम तौर पर करने की सोच भी नहीं सकता है, तो ये सारी चीज़े इंसानी ज़हन पर बहुत गहरा असर करती हैं। फिर चाहे वह इंसान कितनी ही बड़ी शख़्सियत क्यों न हो, चाहे वह गाँधी ही क्यों न हो! गाँधी की तरह ही हर किसी के पास कोई न कोई गोखले भी ज़रुर होता है जो उसे यह बताता है कि क्या जरूरी है।

मोहन दास करम चंद गाँधी से महात्मा गांधी बनने के सफ़र में गाँधी का सिर्फ नाम नहीं बदला था। उनका चरित्र, उनकी सोच, रहन सहन और व्यक्तित्व, सब कुछ बदल गया था।  इन सभी बदलाव की मुख्य वजह गाँधी का ट्रेवल ही रहा है फिर चाहे वो पोरबंदर से लंदन तक वकालत की पढ़ाई के लिए किया गया सफर हो या फिर दक्षिण अफ्रीका में वक़ालत के दौरान हुई बातें। यह वही वक़्त था जब गाँधी ने पहली दफ़ा कस्तूरबा से अपना मैला खुद ढोने की बात कही थी। 

पोरबंदर के दीवान के घर पैदाइश और फिर यूरोप में पढ़ाई गाँधी को एक बड़ा वकील ज़रूर बना देती पर गाँधी को गाँधी बनाने में इन यात्राओं का बहुत बड़ा हाथ है।

Gandhi Train journey in South Africa

इन सब बदलावों में जो सबसे पहले हुआ, वह है गाँधी का इस बात का भ्रम से बहार आना कि वो सिर्फ और सिर्फ फ़र्स्ट क्लास में सफर करने वाले एक प्रिविलेज़्ड अटॉर्नी हैं। जब साउथ अफ्रीका में गोरी चमड़ी ना होने के कारण उन्हें फ़र्स्ट क्लास से बाहर फेंक दिया गया तो उन्हें मालूम चला के फ़र्स्ट क्लास के बाहर भी कोई दुनिया है और शायद वो दुनिया इस फ़र्स्ट क्लास की दुनिया से ज़्यादा वास्तविक है। अगले 21 साल तक गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों से होने वाले भेदभाव के खिलाफ आंदोलन किया।

1915 में गाँधी की भारत वापसी पर गोखले चाहते थे कि गाँधी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ें पर इस वक़्त भारत से, भारतीयों की तख़लीफ़ों से गाँधी का कोई राब्ता नहीं था। भारत उस वक़्त गाँधी के लिए कुछ ऐसा ही था जैसा हमारे आपके लिए कोई नई जगह होती है – हमारे ट्रिप्स पर। किसी जगह से कोई  मुकम्मल रिश्ता बनाने के लिए जरूरी होता है लोगों को जानना। ठीक इसी तरह गाँधी के लिए सबसे जरूरी था पहले भारत को जानना और उसका सिर्फ एक ही तरीका हो सकता था — अपना झोला उठाईये और निकल पड़िये। पूरे एक साल तक गाँधी ने भारत दर्शन किया, कभी कस्तूरबा के साथ, कभी अकेले तो कभी ऐसे लोगों के साथ जिनके साथ इंग्लैंड में पढ़ा हुआ एक वकील शायद कभी बात करने की भी नहीं सोच सकता था।

Gandhi in train journey

आज के वक़्त में भी कई बार हम या आप लोकल बस या रेल के जनरल डिब्बे में सफ़र करने से हिचकिचाते है. यहाँ बात सही है या गलत की नहीं है. बात ये हो रही है कि जो हम अभी तक करते आ रहे हैं, उससे इतर भी कोई दुनिया है, जिसे जानना जरूरी हो सकता है। भारत भ्रमण के बाद जब गाँधी ने कांग्रेस महासभा में पहली बार भाषण दिया तो उन्होंने यही कहा के हम चंद मुट्ठी भर पैसे और पावर वाले लोग 30 करोड़ आम भारतीयों की किस्मत नहीं तय कर सकते।

गांधी ने वक़ालत, पोरबंदर, यूरोप सब को पीछे छोड़ते हुए साबरमती के किनारे एक आश्रम में सादा जीवन शुरू कर दिया था। इसकी वजह शायद वो सब लोग थे जो गाँधी को इन यात्राओं के दौरान मिले थे। कभी कभी यह भी हो जाता है कि हम अपनी यायावरी में किसी ऐसे शख्स से मिलते है जो एक ही बार में सब कुछ उलट कर रख देता है, राजकुमार शुक्ला भी गांधी के लिए कुछ ऐसे ही माहौल में आए थे। चंपारण में नील के किसानों के लिए लड़ी गयी लड़ाई कानूनी लड़ाई थी, सत्याग्रह नहीं था। चंपारण में बिताए छह महीने गाँधी को अपने आश्रम से दूर एक अलग माहौल में ले आए थे और उसके बाद गांधी और ब्रिटिश राज से आज़ादी की लड़ाई, एक दूसरे का पर्याय बन चुके थे। 

Gandhi On Dandi March

अगर आपके पाँवों को चलने की आदत हो जाती है न फिर वो रुकते नहीं, चलते ही रहते हैं और फिर वो होता है जो शायद हम खुद भी कभी नहीं सोच पाते। जो हुआ वो शायद किसी अँग्रेज़ ने तो क्या किसी हिंदुस्तानी ने भी नहीं सोचा था। पोरबंदर से सूरत के डांडी तक एक पैदल यात्रा हुई। अंग्रेज़ों के नमक बनाने के एकाधिकार को चुनौती मिली और हिंदुस्तानी आवाम अब खुद का नमक खाता था, हिंदुस्तान का नमक।

अगस्त 47 की बात है, कलकत्ता में बंगाल के बँटवारे की खबर से कौमी देंगे हो रहे थे। गाँधी ने सिर्फ दिल्ली से कलकत्ता तक सफर नहीं किया, गाँधी कलकत्ता की गलियों में जा कर सब से पूछते फिरते थे कि लोगों को चाहिए क्या? घुमक्कड़ी आपको कहाँ से कहाँ ले आती है और क्या से क्या बना देती है इसकी शायद किसी को भनक तक  नहीं होती है। यात्राओं के दौरान हम कई ऐसी परिस्थितियों से गुजरते है जो हमें झकझोर कर रख देती हैं। यह सब चीज़ें हमें ज़हनी तौर से बदल कर रख देती हैं।

उदाहरण, इंस्पिरेशन, लर्निंग – सब बापू ही हैं!150वां हैप्पी बर्थडे है आज! देसी ट्रैकिंग स्टिक लेकर पूरा इंडिया ट्रेक किएला है भाई बाप ने! और घूम घूम कर ही, क्या उधम मचाया! गांधी की यात्राओं में आपको सेल्फ़ एस्टीम का टूटना, बेसिक सवाल पूछना, गलत और सही को नई समझ देना, एक इन्फ्लुएंसर होना और ऐसी कई चीज़ें मिल जाएंगी जो अपनी यात्राओं पर हम आप भी एक्सपीरियंस करते हैं. 
हमारे लिए तो बापू #travelgoals में आते हैं.
घूमो तो ऐसा घूमो! 

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